जैसा कि दुष्यंत कुमार से
प्रभावित होकर देवनागरी में ग़ज़ल लिखने वाले कई शायर पैदा हुए, उसी सिलसिले में
मेरे भीतर भी एक शायर जन्म हुआ। यह ज़रुर है कि दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में ग़ज़ल की
खुसूसियत ‘बहर’ का भी निबाह हुआ है लेकिन मैं उस खेप में शामिल हो चुका था जो
निज़ामत और हालात को कोसते हुए बेबहर तुकबंदी करते है और दुष्यंत के इर्द-गिर्द
प्रतीकों और बिम्बों को रचकर, खुद को शायर मान लेते है। मैं भी वैसा ही शायर बन
गया जिसने तथाकथित ग़ज़लों का एक दीवान तैयार कर लिया था लेकिन जब तमीज़ आई तो नमूने
के वास्ते दो-चार गज़लें बचाकर, इस दीवान से तौबा की। ये दो-चार ग़ज़लें भी वो थी, जो
किसी छंद या लय के आधार पर लिखी होने के कारण स्वमेव बाबह्र हो गई थी। इसके बाद
तर्ज़-ए-तहरीर ही बदल गई जिसका हासिल यह संग्रह है।
मेरा बचपन देहाती माहौल में
बीता। गाँव के बुजुर्गों की सीख, समझाइश और बातचीत में लोकोक्तियों के साथ-साथ
दोहा, चौपाई आदि छंदों का शामिल होने से कविताई जैसे संस्कारों से ही मुझे मिल गई
थी। तीज-त्योहारों में भजन-मण्डली के साथ बैठता तो निर्गुण पदों से आत्मा-परमात्मा
के प्रतीकों को खोलते हुए सुनकर, कविता के मर्म को भी समझने लगा था। छः-सात साल की
उम्र से ही तुकबंदी आरम्भ हो गई थी। बस्तर के वो गाँव, जहाँ हल्बी प्रमुख बोली थी,
वहां के बच्चों में अपेक्षाकृत बेहतर हिंदी जानने वाला, मैं अंधों में काना राजा
था। इसलिए उनके साथ खेलते हुए टूटी-फूटी तुकबंदी कर अपना रौब जमाता था। उस समय
तुकबंदी का आधार मूलतः भजन और फ़िल्मी गीतों की लय हुआ करती थी। बारह साल की उम्र
में एक कविता, स्थानीय अखबार में छप क्या गई; बस फिर तो डायरियाँ भरती गई। सैकड़ो
कवितायेँ लिख गया जिनमें से कई समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुई।
जब दुष्यंत कुमार साहब की ग़ज़लों से गुजरना हुआ तो ग़ज़ल को प्रमुख विधा बनाने की ठान
ली और अपनी तथाकथित ग़ज़लों का एक दीवान तैयार कर लिया जिसे प्रकाशित करवाने की
हिम्मत नहीं हुई क्योकि मन के किसी कोने में इन ग़ज़लों के शिल्प स्तर पर कमज़ोर होने
का यकीन कुंडली मारे बैठा हुआ था। ये दीवान दस सालों तक वैसे ही पड़ा रहा। ये दौर
रोजगार की जद्दोजहद और नौकरी मिलने पर कर्तव्य-निर्वहन में बीत गया।
वर्ष 2013 में प्रकाशित साझा
संकलन ‘त्रिसुगंधी’ में मेरी दो गज़लें सम्मिलित हुई तो मैं पुनः गज़लें लिखने के
लिए प्रेरित हुआ। इसके बाद लगातार मेरी गज़लें समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रही
और मैं खुद को शायर भी मान चुका था। लेकिन ये ग़लतफ़हमी अधिक दिन नहीं चली। 2014 में
ओपन बुक्स ऑनलाइन वेबसाईट के ग़ज़ल के व्याकरण सम्बन्धी लेखों ने वास्तविकता का आभास
करा दिया। इसी वेबसाईट पर अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत करने लगा, जिनकी सराहना हुई,
गलतियाँ बताई गई, हल सुझाएँ गए। नवम्बर 2014 से अभ्यास का यह सिलसिला आज तक जारी
है। इस संग्रह में करीब एक वर्ष में लिखी गई ग़ज़लों के अलावा, पुराने दीवान की दो
ग़ज़लों को भी सम्मिलित किया है। पिछले संग्रह का नाम भी “अंधेरों की सुबह” ही रखा
था और वह शेर जिनके कारण यह उनवान हुआ है-
सूर्य काला हो गया है,
आसमानी है ख़बर
ये अँधेरों की सुबह अब आपके
पेशे-नज़र
इस शेर में “अंधेरों की
सुबह” का प्रयोग सुबह के वज़्न पर हुआ है, सुब्ह के वज़्न में नहीं। जैसा कि आम
बोलचाल में प्रचलित है। तब मैं बोलता भी ‘सुबह’ ही था और लिखता भी ‘सुबह’ ही। तब
मुझे अरूज़ अनुसार शब्दों के प्रयोग का ज्ञान नहीं था। यद्यपि इस संग्रह में मैंने
शब्दों के मानक रूप का प्रयोग करने का ही प्रयास किया है किन्तु कहीं-कहीं बहर के
निर्वाह के क्रम में शब्दों के प्रचलित रूपों के प्रयोग से भी गुरेज नहीं किया है।
शत-प्रतिशत खेतों में ‘फ़सल’ होती है ‘फस्ल’ नहीं। शहर-शह्र वाला किस्सा अब पुराना
हो चुका है। इसी प्रकार तकाबुले-रदीफैन ऐब और तनाफ़़ुर ऐब से अशआर बचाने की कोशिश
की है लेकिन जहाँ शेर प्रभावित हुआ-सा लगा है, वहां इन्हें रहने दिया है। पिछले एक
वर्ष में अरूज़ को जितना समझ सका हूँ, ये गज़लें, उसी के आधार पर कहने का प्रयास
किया है। इस कोशिश में अगर रिवायती ग़ज़ल के पाठकों को कुछ ख़ामी का अहसास हो तो उसके
लिए मैं तहे-दिल से मुआफी चाहता हूँ। मैं अपनी कोशिश में कितना कामयाब ठहरा हूँ, ये
आप पाठक ही बता सकते है।
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